जब हम कचरा घर के बाहर या सड़क पर फेंक देते हैं तो गुजरने वाला आदमी सरकार पर अक्षमता का आरोप लगाता है। जब हम शौचालय होने के बावजूद खेत में चले जाते हैं और फिर बीमारी फैलती है तो भी सरकार पर दोष और जब हम अपने बच्चे की असली उम्र कम करवाने के लिए किसी नगरपालिका कर्मचारी को रिश्वत देते हैं तो भी भ्रष्टाचार के लिए सरकार को कोसते हैं।
बेशक प्लास्टिक से पर्यावरण को नुकसान के अलावा हमारा सीवर सिस्टम, हमारे जलाशय, नदियां और समुद्र और जानवर तक प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन याद करें कि आज से तीन दशक पहले दूध लाने के लिए स्टील के पात्र का इस्तेमाल किया जाता था और सब्जियों के लिए छोटे-बड़े थैलों का।
दरअसल, सरकार को भी यह अहसास हुआ कि सिंगल यूज प्लास्टिक (एक बार ही प्रयोग होने वाला) पर प्रतिबंध लगाना फिलहाल उचित नहीं होगा जब तक कि इसके सस्ते विकल्प का बड़े पैमाने पर उत्पादन न होने लगे। इसीलिए सरकार ने पूर्ण प्रतिबंध को 2022 तक रोक दिया है पर सरकारी दबाव जारी रहेगा।
जरा सोचिए, धूम्रपान न करना और अगर करना भी तो सार्वजानिक स्थानों पर नहीं- इसके लिए भी अगर सरकार को सख्त कानून बनाना पड़े तो यह हमारे विवेक के लिए चुनौती है। क्या आप स्वस्थ रहे और सिगरेट या बीड़ी पीकर बीमार न हों, शराब पीकर परिवार पर अत्याचार न करें, यह चिंता भी सरकारों को करनी पड़ेगी?
फिर हम सरकारों पर यह आरोप क्यों लगाते हैं कि 70 साल में बाल-मृत्यु दर, साक्षरता या कृषि उत्पादन में हम चीन से पीछे क्यों हैं? क्या स्वच्छता भी सरकारी अभियान का हिस्सा होनी चाहिए? मध्याह्न भोजन इसलिए सरकार ने दिया कि इससे गरीब बच्चे भोजन की चिंता छोड़कर स्कूल आएंगे लेकिन पता चला कि ये बच्चे केवल भोजन के वक्त घर से भेजे जाते हैं।
हमारी आवाज तब नहीं उठती जब मुखिया और हेडमास्टर मिलकर बच्चों के कल्याण या शिक्षा के मद में आने वाले पैसे का बंदरबांट कर लेते हैं, क्योंकि तब हम यह देखते हैं कि मुखिया या हेडमास्टर की जाति क्या है। बेहतर होगा कि शहरी समाज स्वयं ऐसी थैलियां खरीदकर आदतन चले, जिसमें जरूरत के सामान रखना सहज हो। अगर समाज में यह चेतना विकसित हो जाए तो सरकारों को ज्यादा समय असली विकास यानी सड़क बनवाने, अस्पताल व विद्यालय खुलवाने और सेवाओं को अंतिम व्यक्ति के तक पहुंचाने के लिए मिल सकेगा।
बेशक प्लास्टिक से पर्यावरण को नुकसान के अलावा हमारा सीवर सिस्टम, हमारे जलाशय, नदियां और समुद्र और जानवर तक प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन याद करें कि आज से तीन दशक पहले दूध लाने के लिए स्टील के पात्र का इस्तेमाल किया जाता था और सब्जियों के लिए छोटे-बड़े थैलों का।
दरअसल, सरकार को भी यह अहसास हुआ कि सिंगल यूज प्लास्टिक (एक बार ही प्रयोग होने वाला) पर प्रतिबंध लगाना फिलहाल उचित नहीं होगा जब तक कि इसके सस्ते विकल्प का बड़े पैमाने पर उत्पादन न होने लगे। इसीलिए सरकार ने पूर्ण प्रतिबंध को 2022 तक रोक दिया है पर सरकारी दबाव जारी रहेगा।
जरा सोचिए, धूम्रपान न करना और अगर करना भी तो सार्वजानिक स्थानों पर नहीं- इसके लिए भी अगर सरकार को सख्त कानून बनाना पड़े तो यह हमारे विवेक के लिए चुनौती है। क्या आप स्वस्थ रहे और सिगरेट या बीड़ी पीकर बीमार न हों, शराब पीकर परिवार पर अत्याचार न करें, यह चिंता भी सरकारों को करनी पड़ेगी?
फिर हम सरकारों पर यह आरोप क्यों लगाते हैं कि 70 साल में बाल-मृत्यु दर, साक्षरता या कृषि उत्पादन में हम चीन से पीछे क्यों हैं? क्या स्वच्छता भी सरकारी अभियान का हिस्सा होनी चाहिए? मध्याह्न भोजन इसलिए सरकार ने दिया कि इससे गरीब बच्चे भोजन की चिंता छोड़कर स्कूल आएंगे लेकिन पता चला कि ये बच्चे केवल भोजन के वक्त घर से भेजे जाते हैं।
हमारी आवाज तब नहीं उठती जब मुखिया और हेडमास्टर मिलकर बच्चों के कल्याण या शिक्षा के मद में आने वाले पैसे का बंदरबांट कर लेते हैं, क्योंकि तब हम यह देखते हैं कि मुखिया या हेडमास्टर की जाति क्या है। बेहतर होगा कि शहरी समाज स्वयं ऐसी थैलियां खरीदकर आदतन चले, जिसमें जरूरत के सामान रखना सहज हो। अगर समाज में यह चेतना विकसित हो जाए तो सरकारों को ज्यादा समय असली विकास यानी सड़क बनवाने, अस्पताल व विद्यालय खुलवाने और सेवाओं को अंतिम व्यक्ति के तक पहुंचाने के लिए मिल सकेगा।
